अपने ही राजा को जहर क्यों देते थे चाणक्य ? हैरान कर देगी कहानी !

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Chanakya: नीति और शास्त्रों के पिता चाणक्य जैसा युग पुरुष अपने आप में ज्ञान का भंडार थे। उनकी वजह से चंद्रगुप्त का पूरा राज्य बिना किसी भय और रुकावट के चलता था। कहा जाता है, कि चाणक्य ऐसी नीति बनाते जिसके सामने सिकंदर जैसे योद्धा भी घुटने टेक देते थे।

चाणक्य का दौर 375 ईशा पूर्व का है, उस समय राजा महाराजा थोड़े रूढ़िवादी तथा एक दूसरे से ईर्ष्या करने वाले हुआ करते थे। गरीब प्रजा पर अत्याचार करना और कर(टैक्स) से अपना खजाना भरने में लगे रहते थे। यहां तक कि राजाओं के पुत्रों में भी दुश्मनी हुआ करती थी, क्योंकि सभी को राजगद्दी पर बैठने का मोह था। इस काल में राजाओं की हत्याएं भी बहुत हुआ करती थी।

श्रेष्ठ विचार और साधारण जीवन –

चाणक्य चाहते तो राजसी सुख भोग सकते थे, परंतु वे एक मामूली सी कुटिया में साधारण जीवन व्यापन करते थे। चंद्रगुप्त जो कुछ भी थे, वे चाणक्य की बदौलत थे. बावजूद इसके चाणक्य साधारण कुटिया में रहते और अपने श्रेष्ठ ज्ञान से प्रजा के सुख राज्य और देश के हित में कार्य करते थे।

धर्म नही, अपितु कर्म आधार पर वर्गों का निर्माण –

चाणक्य वैद शास्त्र के ज्ञानी विद्वान थे उनका जन्म रावलपिंडी (वर्तमान में पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने लोगों को धर्म नही, अपितु कर्म के आधार पर चार भागों में बांटा है। जिनको आज हम ब्राह्मण, श्रत्रिय, वैश्य, शुद्र के नाम से जानते हैं।

चाणक्य के महत्वपूर्ण सिद्धांत –

आचार्य चाणक्य का जीवन तेजस्विता से भरा रहा. उन्होंने आम लोगों को ज्ञानी बनाने पर भी ध्यान दिया. वे अपने गुरुकुल में शिष्यों के अलावा नगर जनों को भी शिक्षा देते थे. जिसमें से उनके महत्वपूर्ण सिद्धांत कुछ इस प्रकार है –

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1) ऋण, शत्रु और रोग को तुरंत समाप्त करें

चाणक्य का मानना था कि ऋण यदि थोड़ा भी शेष रह जाए तो वह ब्याज के साथ बढ़ने लगता है, शत्रु यदि थोड़ा भी जीवित रहे तो फिर हमला करेगा और रोग थोड़ा भी रह जाए तो फिर हो सकता है. इसलिए इन तीनों को जड़ से खत्म कर देना चाहिए।

2) वन की आग चंदन को भी जला देती है

चाणक्य मानते थे, कि व्यक्ति को हमेशा दुष्ट लोगों से बचकर रहना चाहिए. जैसे जंगल(वन) में आग लगती है तो वह चंदन समान कीमती लकड़ी को भी जला देती है. वैसे ही खराब का संग अच्छे व्यक्ति को भी अपने समान बना देती है।

3) सिंह भूखा होने पर भी तिनके नही खाता

सिंह जंगल का शासक कहा जाता है, जो भूख लगने पर सिर्फ वही चीज खाता है जो उसके खाने लायक है. शिकार ना मिलने पर वह वस्तु (तिनका) नही खाता। वैसे ही सज्जन व्यक्ति को घोर आपदा आने पर भी अपना धर्म त्याग नही करना चाहिए।

4) शत्रु की कमजोरी जानने तक मित्रता बनाए रखे

चाणक्य अनुसार जब तक आपको शत्रु की कमजोरी पता न हो तब तक उससे दोस्ती ही रखनी चाहिए। ये बात पौराणिक काल में राजा महाराजाओं को ध्यान में रख कर बताई है। जब तक राजा को उसके शत्रु की कमजोरी पता न हो तब तक युद्ध नही करना चाहिए।

5) बाल्टी नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से पानी निकालती है

कुँए से पानी निकालने के लिए बाल्टी अपना सर झुका देती है, तभी उसमें पानी भरता है. ठीक उसी प्रकार कपटी व्यक्ति भी अपना काम निकालने के लिए सर झुकाकर और मधुर वचन बोलकर काम निकलाते है।

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चाणक्य की चिंता –

चाणक्य के काल में कई ऐसे राक्षस हुए जो चंद्रगुप्त और चाणक्य को मारना चाहते थे। हालाकि चाणक्य के होते हुए चंद्रगुप्त का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था। वे उस दौरान महामंत्री के पद पर कार्यरत थे। चाणक्य को यही चिंता थी, कि कोई उनके राजा की हत्या ना कर दे।

चाणक्य की रणनीति –

उस काल में जहर देकर लोगों की हत्याएं आम बात हुआ करती थी। कई राजाओं के साथ ऐसा हो चुका था । हालांकि चंद्रगुप्त को बचाने के लिए चाणक्य ने एक रणनीति अपनाई थी। चाणक्य को ना सिर्फ राजनीति, अर्थशास्त्र, वेद शास्त्र का ज्ञान नही था, बल्कि आयुर्वेद का भी ज्ञान रखते थे। उन्होंने राजा को दुष्ट लोगों से बचाने के लिए राजा को खाने में जहर देना शुरू किया।

अपने ही राजा को जहर क्यों देते थे चाणक्य? –

उस समय माना जाता था, कि यदि जहर को बहुत कम मात्रा में रोज दिया किया जाए, तो उसका असर फिर नही होता. क्योंकि शरीर में जहर को सहन और पच जाने की शक्ति बनती है। चाणक्य ने चंद्रगुप्त को भोजन में अमुक मात्रा में जहर मिलाकर परोसना शुरू किया. हालाकि एक दिन एक ऐसी घटना बनी जो हैरान कर गई।

जहर से हुई मृत्यु –

एक दिन सम्राट कि थाली का भोजन महारानी ने कर लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई. उस समय महारानी के गर्भ में बच्चा पल रहा था जोकि प्रसुतिकाल के निकट थी। चाणक्य को महारानी से मरने से बहुत दुख हुआ. फिर उन्होंने वेदों को महारानी का पेट चिर बच्चा बाहर निकालने का सुझाव दिया और किस्मत इतनी अच्छी थी कि मृत महारानी के पेट से बच्चा जीवित बाहर निकला. सिर पर बिंदु का निशान होने से उसका नाम चाणक्य ने बिंदुसार रखा।

चाणक्य की मृत्यु कैसे हुई ?

चंद्रगुप्त वृद्ध होकर राज शासन अपने पुत्र बिंदुसार को सौप देते है. अन्य मंत्री तथा दरबारी चाणक्य से जलने लगते है। बिंदुसार का मंत्री सुबंधु चाणक्य से राजा को अलग थलग करने के लिए उनके कान भर देता है और अधूरी कहानी बताते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, कि चाणक्य ने ही उनकी माता को जहर देकर मारा था. इस पर बिंदुसार बहुत क्रोधित हो जाते है।

जब चाणक्य को यह पता चलता है तो वे दुखी होकर गोबर और लकड़ी इकट्ठा करके अपनी अर्थी बनाकर उस पर अनशन करने बैठ जाते है। हालाकि दाई जो बिंदुसार की माता को सेवक थी वह उन्हें सत्य बता देती है, कि चाणक्य ने उनकी माता को नही मारा है। पूरी कहानी जानकर बिंदुसार, चाणक्य को वापस महल में लाने और सुबन्धु को क्षमा मांगने कहते है। रोने बिलखने से चाणक्य सुबन्धु को माफ तो कर देते है, लेकिन अनशन पर बैठे रहते है और किसी तरह चिता पर लगे दीप धुएं से चाणक्य की बनाई चिता जल उठती है और वे भस्म में परिवर्तित हो जाते है।

चाणक्य की मृत्यु को लेकर कई अन्य कथाएं भी प्रचलित है. कुछ मत अनुसार सुबन्धु ने चाणक्य की चिता को जलाई थी। हालाकि यह आज भी चर्चा और खोज का विषय है।

चाणक्य की नीतियों के आगे कई मंत्रियों के पैर कांपते थे। उनके राज्य और देश के प्रति प्रेम को आज भी खूब सुना जाता है।


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